आज भारत में जब भी फुटबॉल की बात होती है, तो सबसे पहले लोगों के ज़हन में लियोनेल मेसी जैसे विदेशी सितारों का नाम आता है। लेकिन बहुत कम लोग यह सोचते हैं कि भारतीय फुटबॉल के सबसे बड़े चेहरे सुनील छेत्री को वही सम्मान क्यों नहीं मिलता जिसके वह हकदार हैं। यह मुद्दा सिर्फ एक खिलाड़ी का नहीं, बल्कि भारतीय फुटबॉल सपोर्ट और देश की खेल संस्कृति से जुड़ा हुआ है। अगर हमें भारत में फुटबॉल का भविष्य मजबूत बनाना है, तो हमें अपने खिलाड़ियों को समझना और समर्थन देना सीखना होगा।
1. सुनील छेत्री: भारतीय फुटबॉल की रीढ़
सुनील छेत्री केवल एक फुटबॉलर नहीं, बल्कि भारतीय फुटबॉल की पहचान हैं। उन्होंने सालों तक बिना किसी बड़े मंच या ग्लैमर के देश के लिए खेला और लगातार गोल करके भारत का नाम ऊँचा किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके गोल रिकॉर्ड कई दिग्गज खिलाड़ियों से बेहतर हैं। इसके बावजूद उन्हें वह लोकप्रियता नहीं मिल पाई, जो विदेशी खिलाड़ियों को मिलती है। यह दिखाता है कि भारत में अभी भी अपने खिलाड़ियों को पहचानने की कमी है।
2. मेसी की लोकप्रियता बनाम भारतीय खिलाड़ियों की अनदेखी
लियोनेल मेसी एक महान खिलाड़ी हैं और उनका सम्मान पूरी दुनिया में होता है। लेकिन भारत में कई बार यह सम्मान अंधी दीवानगी में बदल जाता है। लोग विदेशी खिलाड़ियों की जर्सी पहनते हैं, उनके पोस्टर लगाते हैं, लेकिन अपने देश के खिलाड़ियों को भूल जाते हैं। इसका कारण है मीडिया कवरेज, मार्केटिंग और विदेशी लीग्स का प्रभाव। दुर्भाग्य से भारतीय फुटबॉल को वह मंच नहीं मिल पाया, जिसकी वजह से हमारे खिलाड़ी पीछे छूट जाते हैं।
3. भारतीय फुटबॉल को समर्थन क्यों ज़रूरी है
अगर आज हम भारतीय फुटबॉल को समर्थन नहीं देंगे, तो आने वाली पीढ़ी इस खेल को अपनाने से हिचकेगी। जब बच्चे देखते हैं कि देश अपने खिलाड़ियों को सम्मान देता है, तभी वे प्रेरित होते हैं। सुनील छेत्री जैसे खिलाड़ी रोल मॉडल बन सकते हैं, लेकिन इसके लिए जनता का साथ जरूरी है। टिकट खरीदना, मैच देखना, सोशल मीडिया पर सपोर्ट दिखाना — ये छोटे कदम भारतीय फुटबॉल को बड़ा बना सकते हैं।
4. समस्या खिलाड़ियों में नहीं, सिस्टम और सोच में है
अक्सर लोग कहते हैं कि “भारत में अच्छे फुटबॉलर नहीं हैं”, लेकिन सच्चाई यह है कि समस्या खिलाड़ियों में नहीं, बल्कि सिस्टम और हमारी सोच में है। सीमित सुविधाएँ, कम निवेश और कम दर्शक — ये सभी कारण भारतीय फुटबॉल को पीछे खींचते हैं। जब तक हम अपने खिलाड़ियों को महत्व नहीं देंगे, तब तक बदलाव संभव नहीं है। सुनील छेत्री की खाली स्टेडियम वाली अपील इस सच्चाई का सबसे बड़ा उदाहरण है।
5. देश के खेल, देश का सम्मान
हर देश अपने खिलाड़ियों पर गर्व करता है। अर्जेंटीना को मेसी पर गर्व है, वैसे ही भारत को सुनील छेत्री पर होना चाहिए। विदेशी खिलाड़ियों को पसंद करना गलत नहीं है, लेकिन अपने देश के हीरो को नज़रअंदाज करना गलत ज़रूर है। भारतीय फुटबॉल को सम्मान देना, असल में देश का सम्मान करना है।
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Conclusion (Call to Action)
सुनील छेत्री जैसे खिलाड़ी भारतीय फुटबॉल की नींव हैं। अगर आज हम उन्हें समर्थन देंगे, तो कल भारत को बेहतर खिलाड़ी और मजबूत फुटबॉल संस्कृति मिलेगी। अब समय आ गया है कि हम सिर्फ विदेशी सितारों के पीछे भागना बंद करें और भारतीय फुटबॉल सपोर्ट को अपनी जिम्मेदारी समझें।
अगली बार जब भारत खेले, स्टेडियम जाएँ, टीवी ऑन करें और अपने खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाएँ।
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